उचित क्या है
करना तुम्हारा श्रृंगार
नियति की भी तो पहचानो धार।
नाबालिग नहीं हो
समझते हो, प्राप्त तुम्हे वोट का अधिकार।
अपनी उर्जा अपनी चेतना शक्ति को
समुचित दिशा दो
अनर्गल चेस्ताओं में समय क्यों गंवाते हो
सीढह करो मानव शरिर का अधिकार।
करो अपने में अपने से अलग
अपने ही द्वारा
एक आविष्कार
जहाँ निति, नियंता, विधाता
एक हो जायें
एक प्रयोग
सफल भी हो सकते हो
असफलता का भय भी है
परन्तु क्या केवल इसी भय से
नियति की सुनते रहोगे फटकार।
क्या गलत है की परिस्थिति प्रतिकूल है
पर्यावरण, परिवेश प्रदूषित है
जलाओ एक ऐसी मशाल
जिससे निकले स्वांस लेने लायक
ऑक्सीजन
एक नया प्रयोग करो अपने में
धधक उठो!!!
प्रकाश तो होना ही है
पर ये भी याद रखना
समय तुम्हारे नियंत्रण की चीज़ नहीं है।
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