Sunday, April 11, 2010

अंतहीन मध्य

हे अगम!
भौतिक विज्ञानं का नियम है
प्रत्येक पदार्थ केन्द्रसाहित है।
परन्तु तुम सबके केंद्र,
मेरी कल्पना है ये॥
हे अगोचर!
तुम्हारी श्रइसटी का रहस्य तुम स्वयं हो
निर्माण विनास का बेजोड़ संयोग
क्या खूब किया तुमने
की जो भी शुरू हुआ, हो गया
उसका अंत निश्चित कर दिया।
मैंने पूछा
अपने भीतर,
शायद कुछ अमर हो
परन्तु "कीर्ति" तक को मरणशील पाया।
हे निर्द्वंद!
केवल और केवल मुझे मेरा मध्य दिखा दो
वो जो अंतहीन मध्य है
जहाँ तुम स्वयं हो॥

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