Friday, April 9, 2010

सफ़र का ठिकाना

था सफ़र बहुत सुहाना
तुम्हारा साथ बहुत पुराना
कहानियों के साथ रहे कटती
अकेलों का कोई तय ठिकाना
फिर भी सुराग मंजिलों का
खोजते फिरते, करते बयां अफसाना
था सफ़र बहुत सुहाना॥
कस के दामन पकड़ तुमहारा
दिख चला था अब किनारा
होठ खीचें मुस्कुराने
पर समय कम दुरी ज्यादा, तय था डूबना हमारा
बगलगीर हो चुके मौत की
अब तुम ही बदलना धारा
था सफ़र बहुत पुराना॥
चिक-चिक बहती हवा अनजानी
खुसबू मौसम की थी अनजानी
पानी की डगर कितनी पुराणी
अब डूबे की तब डूबे
रुके सांस की बह चले
इस सफ़र का न कोई ठिकाना
था ये सफ़र बहुत पुराना॥

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