Wednesday, April 7, 2010

समाधी

आओ न तुम्हे चाँद दिखाएं

चाँद भी शर्मा उठे उशे ऐसी रौशनी दिखाएं।

चाँद

आसमान में इठलाता घूमता

हैरान हो उठेगा

मैं गर्व से जमीन पे जब सितारे खोजूंगा।

मेरी जान

बादलों की बिख्राहत घबरा उठेगी

जब तुम्हारी जुल्फें खुल जायेंगी

चमक बिजली की धुंधली होगी

अचानक जो तुम्हारी पलक खुल जाएगी

मैं इत्त्रऊंगा

तुम कितनी सुन्दर हो॥

एक दिन की बात है

तुम पिली साडी में पहाड़ी से उतर रही थी

मैं अचंभित रह गया

उषा का आगमन पश्चिम से कैसे

गौर से देखा

तुम थी।

तुम्हारा गोरा बदन अग्नि सिखा लग रहा था।

तुम्हारे कसे स्तन

आधा दीखता पेट का किनारा

आधे मुस्कुराते होठ

उठेतइ झुकते पलक

तुम्हारी लहरों सी चाल

जी आया की तुम्हारी राहों में बिछ जायूं

शिव की समाधी

तुम्हारे रूप के सामने तुच्छ थी

मेरे सामने तुम जब आ कड़ी हुई

तुमने हाथ के इशारे से बताया

तुम मंदिर गयी थी।

वोह इशारा क्या था?

एक दिसा थी

एक राह था

एक साअदा काइंवास था

एक संपूर्ण कला का प्रदर्सन था

मैं अभिभुत रह गया

सौंदर्य तुम्हारा अनंत था।

मैं सीमा युक्त मानव

अशीम की क्या वर्णन करूँगा?

मैं सोच रहा था

पूजा करते वक्त तुम कैसी लगती होगी?

तुम्हारी बंद आँखें

जब अभिस्ट का स्मरण करेंगी

वो

पाषण प्रतिमा सजीव हो उठेगी

कहीं तुम्हारे सौन्दर्यग्नी में पिघल ही न जाये

तभी तुमने पूछा

क्या सोच रहे हो?

मैं, मेरी वाणी

निश्चल हो उठी थी

मैंने इशारे में बताया

मैं असमर्थ हूँ

बोलने में

उसने आश्चर्य से मेरी तरफ देखा

सोचा शायद तबियत ख़राब है

तब मैंने उशे कंधे पे पकड़ा

उसने अकचका कर मेरी तरफ देखा

मैंने कहा ,

मैं मरना चाहता हूँ

अभी यहीं पे, उसने मेरे मुंह पे अपने हाथ रख दिए

वो हाथ क्या थे

रेशम थे

मेरा अंतःकरण उस स्पर्श की प्रतिक्रिया में इतना स्ताभ्धा रह गया

मैं आश्चर्य में था

मौन

इतना तीब्र अनुभूत कभी नहीं हुआ था

शायद यही समाधी थी।

मैं , " third person" हो गया था।

उसने कहा

ऐसे नहीं कहते

मैं तुम्हारी ही हूँ

मैं सोच कर मन में हंसा

मैं मानव सामर्थ्यहीन इस अमृत को कैसे पा सकता हूँ।

मैं चुप था।

उसके गर्दन पे हाथ डाल

अपने सभी बहारों को उसके

विस्वमोहिनी सौंदर्य के सामने रख कर

धीरे धीरे चला जा रहा था

कहाँ अभी तक अग्यात है


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