Tuesday, April 6, 2010

समय की गर्द.

समय के गर्द पे
समय की ही हवा चली।
मैं, मेरा दिल, मेरा मस्तिस्क
ये क्या
कुछ-कुछ साफ़ हो रहा था
धीरे -धीरे एक आकृति स्पस्ट हो रही थी
अरे!
ये तो तुम हो
अतीत ने बहुत गहरा दाग किया
तुम्हारी वही आँखें
मुझे लगा मेरा मन मुझे अजंता की गुफाओं में ले आया है।
मन की गति
हवा से भी तेज।
हाँ! समय के हवा से भी
तुम्हारे वही होठ
नाजुक, कोमल रेसम से चिकने
मुझे लगा
किसी ने गुलाब बिखेर दिए चारो तरफ
मुस्कराहट
होठों को और भी खुबसूरत बना रही थी
तुम्हारी पलकें
झुकी, बंद या खुली, मैं तय नहीं कर पाया
तुम कुछ कहो
मेरा इन्तजार, इन्तजार ही रह गया
तुमने कुछ नहीं कहा
भला समय अजंता की मूर्तियों का मौन तोड़ सका है।

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