Monday, April 5, 2010

मेरी सोच

ज़िन्दगी नृत्य करते बढ़ रही थी
बूंदें लहरों से निकल कर
फिर से लहरों में समां रही थी।
विज्लियाँ चमकती बादलों में खो रही थी।
हवा का कलेवर हर क्षण बदल रहा था।
दूर से शहर का कोलाहल आ रहा था।
मैं सोच रहा था।
इतने संजोग एक साथ कैसे
चूँकि मैंने सोचा उसी समय सोचा इस लिए तो ये सब न था
क्या नहीं होता ये सब
अगर हम सोचते नहीं इन बातon पे तो।
ये हतप्रभ निसान क्या नहीं होते
नहीं, मैं सोचूं या न सोचूं
जीवन का उद्दयम नृत्य चलता रहता
ये तो महज एक संजोग है
की ठीक उसी समाया तुम साक्षी बन गए उन घटनाओं की
ठीक उसी समय तुमने सोचा
जब की ये सब तो होना ही था
तुम होते या न होते , सोचते या न सोचते
फिर भी बूंदें लहरों से निकलती लहरों में समाती
बादलों में विजली रह-रह कर चमकती
हवा का कलेवर हर क्षण बदलता
और दूर से शहर का कोलाहल आता रहता।

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