Wednesday, April 14, 2010
दर्द
सिसकारी ही परिभासा है जिसकी।
लाचारी, आह है जिसकी।
धैर्य, क्या कह दें , गुलाम है नियति की।
सच क्या है,
कौन समझाएगा।
मन ही मन को परेसान करे जब।
कह दें झुटा
लेकिन किसको
हम ही तो हैं वहां भी।
ओह! की शुरुआत, ख़तम आह! पे
आशिकुई कैसे करें, इससे
वह रे हज़रात! ये दर्द
महसूस ही इसको करें
पर मंजिल मक़सूद तुम्हारी मिलेगी तभी
जब वाह-वाह हर दर्द पे करें
मुस्कराहट को खिला के रखे
दर्द को ऐसा कहें॥
Sunday, April 11, 2010
अंतहीन मध्य
भौतिक विज्ञानं का नियम है
प्रत्येक पदार्थ केन्द्रसाहित है।
परन्तु तुम सबके केंद्र,
मेरी कल्पना है ये॥
हे अगोचर!
तुम्हारी श्रइसटी का रहस्य तुम स्वयं हो
निर्माण विनास का बेजोड़ संयोग
क्या खूब किया तुमने
की जो भी शुरू हुआ, हो गया
उसका अंत निश्चित कर दिया।
मैंने पूछा
अपने भीतर,
शायद कुछ अमर हो
परन्तु "कीर्ति" तक को मरणशील पाया।
हे निर्द्वंद!
केवल और केवल मुझे मेरा मध्य दिखा दो
वो जो अंतहीन मध्य है
जहाँ तुम स्वयं हो॥
Friday, April 9, 2010
सफ़र का ठिकाना
तुम्हारा साथ बहुत पुराना
कहानियों के साथ रहे कटती
अकेलों का कोई तय ठिकाना
फिर भी सुराग मंजिलों का
खोजते फिरते, करते बयां अफसाना
था सफ़र बहुत सुहाना॥
कस के दामन पकड़ तुमहारा
दिख चला था अब किनारा
होठ खीचें मुस्कुराने
पर समय कम दुरी ज्यादा, तय था डूबना हमारा
बगलगीर हो चुके मौत की
अब तुम ही बदलना धारा
था सफ़र बहुत पुराना॥
चिक-चिक बहती हवा अनजानी
खुसबू मौसम की थी अनजानी
पानी की डगर कितनी पुराणी
अब डूबे की तब डूबे
रुके सांस की बह चले
इस सफ़र का न कोई ठिकाना
था ये सफ़र बहुत पुराना॥
Wednesday, April 7, 2010
समाधी
आओ न तुम्हे चाँद दिखाएं
चाँद भी शर्मा उठे उशे ऐसी रौशनी दिखाएं।
चाँद
आसमान में इठलाता घूमता
हैरान हो उठेगा
मैं गर्व से जमीन पे जब सितारे खोजूंगा।
मेरी जान
बादलों की बिख्राहत घबरा उठेगी
जब तुम्हारी जुल्फें खुल जायेंगी
चमक बिजली की धुंधली होगी
अचानक जो तुम्हारी पलक खुल जाएगी
मैं इत्त्रऊंगा
तुम कितनी सुन्दर हो॥
एक दिन की बात है
तुम पिली साडी में पहाड़ी से उतर रही थी
मैं अचंभित रह गया
उषा का आगमन पश्चिम से कैसे
गौर से देखा
तुम थी।
तुम्हारा गोरा बदन अग्नि सिखा लग रहा था।
तुम्हारे कसे स्तन
आधा दीखता पेट का किनारा
आधे मुस्कुराते होठ
उठेतइ झुकते पलक
तुम्हारी लहरों सी चाल
जी आया की तुम्हारी राहों में बिछ जायूं
शिव की समाधी
तुम्हारे रूप के सामने तुच्छ थी
मेरे सामने तुम जब आ कड़ी हुई
तुमने हाथ के इशारे से बताया
तुम मंदिर गयी थी।
वोह इशारा क्या था?
एक दिसा थी
एक राह था
एक साअदा काइंवास था
एक संपूर्ण कला का प्रदर्सन था
मैं अभिभुत रह गया
सौंदर्य तुम्हारा अनंत था।
मैं सीमा युक्त मानव
अशीम की क्या वर्णन करूँगा?
मैं सोच रहा था
पूजा करते वक्त तुम कैसी लगती होगी?
तुम्हारी बंद आँखें
जब अभिस्ट का स्मरण करेंगी
वो
पाषण प्रतिमा सजीव हो उठेगी
कहीं तुम्हारे सौन्दर्यग्नी में पिघल ही न जाये
तभी तुमने पूछा
क्या सोच रहे हो?
मैं, मेरी वाणी
निश्चल हो उठी थी
मैंने इशारे में बताया
मैं असमर्थ हूँ
बोलने में
उसने आश्चर्य से मेरी तरफ देखा
सोचा शायद तबियत ख़राब है
तब मैंने उशे कंधे पे पकड़ा
उसने अकचका कर मेरी तरफ देखा
मैंने कहा ,
मैं मरना चाहता हूँ
अभी यहीं पे, उसने मेरे मुंह पे अपने हाथ रख दिए
वो हाथ क्या थे
रेशम थे
मेरा अंतःकरण उस स्पर्श की प्रतिक्रिया में इतना स्ताभ्धा रह गया
मैं आश्चर्य में था
मौन
इतना तीब्र अनुभूत कभी नहीं हुआ था
शायद यही समाधी थी।
मैं , " third person" हो गया था।
उसने कहा
ऐसे नहीं कहते
मैं तुम्हारी ही हूँ
मैं सोच कर मन में हंसा
मैं मानव सामर्थ्यहीन इस अमृत को कैसे पा सकता हूँ।
मैं चुप था।
उसके गर्दन पे हाथ डाल
अपने सभी बहारों को उसके
विस्वमोहिनी सौंदर्य के सामने रख कर
धीरे धीरे चला जा रहा था
कहाँ अभी तक अग्यात है
Tuesday, April 6, 2010
समय की गर्द.
समय की ही हवा चली।
मैं, मेरा दिल, मेरा मस्तिस्क
ये क्या
कुछ-कुछ साफ़ हो रहा था
धीरे -धीरे एक आकृति स्पस्ट हो रही थी
अरे!
ये तो तुम हो
अतीत ने बहुत गहरा दाग किया
तुम्हारी वही आँखें
मुझे लगा मेरा मन मुझे अजंता की गुफाओं में ले आया है।
मन की गति
हवा से भी तेज।
हाँ! समय के हवा से भी
तुम्हारे वही होठ
नाजुक, कोमल रेसम से चिकने
मुझे लगा
किसी ने गुलाब बिखेर दिए चारो तरफ
मुस्कराहट
होठों को और भी खुबसूरत बना रही थी
तुम्हारी पलकें
झुकी, बंद या खुली, मैं तय नहीं कर पाया
तुम कुछ कहो
मेरा इन्तजार, इन्तजार ही रह गया
तुमने कुछ नहीं कहा
भला समय अजंता की मूर्तियों का मौन तोड़ सका है।
Monday, April 5, 2010
एक क्षण
करना तुम्हारा श्रृंगार
नियति की भी तो पहचानो धार।
नाबालिग नहीं हो
समझते हो, प्राप्त तुम्हे वोट का अधिकार।
अपनी उर्जा अपनी चेतना शक्ति को
समुचित दिशा दो
अनर्गल चेस्ताओं में समय क्यों गंवाते हो
सीढह करो मानव शरिर का अधिकार।
करो अपने में अपने से अलग
अपने ही द्वारा
एक आविष्कार
जहाँ निति, नियंता, विधाता
एक हो जायें
एक प्रयोग
सफल भी हो सकते हो
असफलता का भय भी है
परन्तु क्या केवल इसी भय से
नियति की सुनते रहोगे फटकार।
क्या गलत है की परिस्थिति प्रतिकूल है
पर्यावरण, परिवेश प्रदूषित है
जलाओ एक ऐसी मशाल
जिससे निकले स्वांस लेने लायक
ऑक्सीजन
एक नया प्रयोग करो अपने में
धधक उठो!!!
प्रकाश तो होना ही है
पर ये भी याद रखना
समय तुम्हारे नियंत्रण की चीज़ नहीं है।
मेरी सोच
बूंदें लहरों से निकल कर
फिर से लहरों में समां रही थी।
विज्लियाँ चमकती बादलों में खो रही थी।
हवा का कलेवर हर क्षण बदल रहा था।
दूर से शहर का कोलाहल आ रहा था।
मैं सोच रहा था।
इतने संजोग एक साथ कैसे
चूँकि मैंने सोचा उसी समय सोचा इस लिए तो ये सब न था
क्या नहीं होता ये सब
अगर हम सोचते नहीं इन बातon पे तो।
ये हतप्रभ निसान क्या नहीं होते
नहीं, मैं सोचूं या न सोचूं
जीवन का उद्दयम नृत्य चलता रहता
ये तो महज एक संजोग है
की ठीक उसी समाया तुम साक्षी बन गए उन घटनाओं की
ठीक उसी समय तुमने सोचा
जब की ये सब तो होना ही था
तुम होते या न होते , सोचते या न सोचते
फिर भी बूंदें लहरों से निकलती लहरों में समाती
बादलों में विजली रह-रह कर चमकती
हवा का कलेवर हर क्षण बदलता
और दूर से शहर का कोलाहल आता रहता।
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